Pandit Lakhmi Chand | पंडित लखमी चन्द

Pandit Lakhmi Chand (पंडित लखमी चन्द)

पं॰ लखमीचन्द 1903-1945 हरियाणा के सूर्यकवि एवं हरियाणवी भाषा के शेक्सपीयर के रूप में विख्यात पं॰ लखमीचन्द का जन्म सन 1901 में तत्कालीन रोहतक जिले के सोनीपत तहसील मे यमुना नदी के किनारे बसे जांटी नामक गाँव के साधरण गौड़ ब्राह्मण परिवार मे हुआ ।

पंडित लखमी चन्द का जीवन परिचय

पंडित लखमीचंद के पिता पं॰ उमदीराम एक साधारण से किसान थे ,जो अपनी थोड़ी सी जमीन पर कृषि करके समस्त परिवार का पालन – पोषण करते थे । जब लखमीचन्द कुछ बड़े हुए तो उन्हें विद्यालय न भेजकर गोचारण का काम दिया गया । गीत संगीत की लगन उन्हें बचपन से ही थी , अतः अन्य साथी ग्वालों के साथ घूमते –फिरते उनके मुख से सुने हुए टूटे –फूटे गीतों और रागनियों को गुनगुनाकर समय यापन करते थे ।

आयु बढने के साथ –साथ गीत-संगीत के प्रति उनकी आसक्ति इस कदर बढ़ गई की तात्कालीन लोककला साँग देखने के लिए कई-कई दिन बिना बताए घर से गायब रहते थे । एक बार उस समय के प्रसिद्ध साँगी पं॰ दीपचन्द का साँग देखने के लिए ,तथा दूसरी बार श्री निहाल सिंह का साँग देखने के लिए वे कई दिनों के लिए घर से गायब हो गए । तब बड़ी मुश्किल से उनके घरवाले उन्हें ढूंढकर घर लाए ।

हरियाणा के सूर्य कवि पं॰ लखमीचन्द

इन्हीं दिनों पं॰ लखमीचन्द के जीवन मे एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ सौभाग्य से तात्कालीन सुप्रसिद्ध लोककवि मानसिंह उनके गाँव में एक विवाहोत्सव पर भजन गाने के लिए आमंत्रित होकर पधारे । कवि मानसिंह की मधुर कंठ-माधुरी ने किशोरायु लखमीचन्द का कुछ ऐसा मन मोहित किया कि प्रथम भेंट मे ही उन्होने श्री मानसिंह को अपना सतगुरु बना लिया और अपनी संगीत-पिपासा को शांत करने के लिए गुरु के साथ चल दिए ।

लगभग एक साल तक पूरी निष्ठा एवं लगन के गुरु सेवा करके घर लौटे तो वे गायन एवं वादन कि कला के साथ-साथ एक लोक –कवि भी बन चुके थे । कहते हैं कि वैसे तो मानसिंह अपने जमाने के एक साधारण कवि गायक ही थे परंतु शिष्य का लगाव और श्रद्धा इतनी गहरी थी कि गुरु प्रभाव उसी प्रकार फलदायक हुआ जिस प्रकार सीधे-साधे सकुरात का अपने शिष्य प्लूटो पर या श्री रामानन्द का कबीर पर ।

पं॰ लखमीचन्द के गुरु कौन थे ?

पं॰ लखमीचन्द का संपूर्ण जीवन गुरुमय रहा । गायन कला के पश्चात अभिनय कला में महारत अर्जित करने हेतु ये कुछ दिनों मेहंदीपुर निवासी श्रीचंद साँगी की साँग मंडली ने भी रहे तथा बाद में विख्यात साँगी सोहन कुंडलवाला के बेड़े मे भी रहे परंतु अपना गुरु श्री मानसिंह को ही स्वीकार किया । कुछ दिनों के बाद लघभग बीस साल कि आयु में पं॰ लखमीचन्द ने अपने गुरूभाई जयलाल उर्फ जैली के साथ मिलकर स्वतंत्र साँग मंडली बना ली और सारे हरियाणा में घूम–घूम कर अपने स्वयं रचित सांगो का प्रचार करने लगे तो कुछ ही दिनों में सफलता और लोकप्रियता के सोपान चढ़ गए तथा सर्वाधिक लोकप्रिय साँगी, सूर्यकवि का दर्जा हासिल कर गए ।

प्रारम्भ में इनके साँग श्रंगार रस से परिपूरित थे जो बाद में सामजिकता, नैतिक मूल्यों एवं अध्यात्म का चरम एहसास लिए हुए हैं । इस प्रकार इन्होने समाज के हर वर्ग मे अपनी पैठ बनाई जिस कारण आज भी इनकी कई काव्य पंक्तियाँ हरियाणवी समाज में कहावतों कोई भांति प्रयोग कि जाती हैं ।

पंडित लखमीचन्द बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ।

श्री लखमीचन्द बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । वे केवल एक लोककवि या लोक कलाकार ही नहीं अपितु एक उदारचेता , दानी ,एवं लोक-कल्याण कि भावना से ओतप्रोत समाज-सुधारक थे । इनकी बुद्धिमत्ता एवं गायन कौशल को देखकर प्रसिद स्वतन्त्रता सेनानी एवं संस्कृत के विद्वान पं॰ टीकाराम(रोहतक निवासी ) ने इनको बहुत दिनों अपने पास ठहराया तथा संस्कृत भाषा एवं वेदों का अध्ययन कराया ।

Pandit Lakhmi Chand – पंडित लखमी चन्द के सांग

श्री लखमीचन्द द्वारा रचित सांगों की संख्या बीस से अधिक है जिनमे प्रमुख हैं – नौटंकी , हूर मेनका ,भक्त पूर्णमल, मीराबाई , सेठ ताराचंद , सत्यवान-सावित्री , शाही लकड़हारा , चीर पर्व (महाभारत ) कृष्ण-जन्म ,राजा भोज – शरणदेय ,नल-दमयंती , राजपूत चापसिंह ,पद्मावत ,भूप पुरंजय आदि । सांगो के अतिरिक्त इन्होने कुछ मुक्तक पदों एवं रागनियों की रचना भी की है जिनमे भक्ति भावना , साधु सेवा ,गऊ सेवा , सामाजिकता , नैतिकता , देशप्रेम , मानवता, दानशीलता आदि भावों की सर्वोतम अभिव्यक्ति है ।

पं॰ जी की रचनाओं में संगीत एवं कला पक्ष सर्वाधिक रूप से मजबूत होता है । विभिन्न काव्य शिल्प रूप जैसे – अलंकार सौन्दर्य एवं विविधता , छंद –विधान की भिन्नता , भाषा में तुकबंदी एवं नाद सौन्दर्य , मुहावरों एवं लोकोक्तियों का कुशलता पूर्वक प्रयोग ,छंदो की नयी चाल आदि शिल्प एवं भाव गुण इन्हे कविश्रेष्ठ , सूर्यकवि , कविशिरोमणि जैसी उपाधियाँ देने को सार्थक सिद्ध करते हैं ।

पंडित लखमी चन्द का देहांत

हरियाणवी संस्कृति के पुरोधा और लोकनायक पं॰ लखमीचन्द का देहांत सन 1945 में मात्र 44 वर्ष की आयु मे ही हो गया ।

 

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