चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास- Chittorgarh Fort History in Hindi

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास : In this article, we are providing information about Chittorgarh Fort in Hindi- Chittorgarh Fort History in Hindi Language. हिस्ट्री ऑफ चित्तौड़गढ़ किले | चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास और तथ्य

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास- Chittorgarh Fort History in Hindi

चित्तौड़गढ़ किला भारत के किलों में सबसे बड़ा किला है। यह राज्यस्थान के किलों में सबसे शानदार है। यह प्राचीन काल में मेवाड़ की राजधानी हुआ करता था। यह एक वर्लड हेरिटेज साईट भी है।

Chittorgarh Fort History in Hindi

Chittorgarh kila ka itihas कहा जाता है कि किले का निर्माण साँतवी सदी में हुआ था और 734 में ( Who built Chittorgarh Fort )इसका निर्माण सिसोदिया वंश के शासक बप्पा रावल ने करवाया था। चित्तौड़गढ़ किले पर शताब्दी से 1568 तक राजपूतों ने राज किया 1567 में अकबर ने किले को घेर लिया था। 15-16 वीं शताब्दी में किले को तीन बार लूटा गया था और इसे बचाने के लिए राजपुतों ने बहुत ही वीरता दिखाई थी।

1303 में अलाउद्दीन खिजली ने किले को घेर लिया था और उसने राना रत्न सिंह को हरा दिया था। राना रत्न सिंह की हार का पता चलते ही उनकी रानी पद्मिनी 16000 सैनिकों की पत्नी और बच्चों ने जौहर कर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। सन् 1535 में गुजरात के शासक सुलतान बहादुर शाह ने राजा बिक्रमजीत सिंह को प्राजित किया था और सन् 1567 में अकबर ने महाराणा उड़ाई सिंह द्वीतीय को प्राजित किया था और किले को लूटकर उसका विनाश कर दिया था।

1905 में किले की मरम्मत की गई थी। सिर्फ आक्रमण काल को छोड़कर शुरू से आखिरी तक यह किला गुहोलिट के सिसोदिया को नियंत्रण में रहा था।

चित्तौड़गढ़ किले की वस्तु कला- Architecture Information about Chittorgarh Fort in Hindi

चित्तौड़गढ़ का किला 180 मीटर ऊणची पहाड़ी पर बना हुआ है और 691.9 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। जैमल पता सरोवर के पास हमें छोटे बुद्ध के स्तूपा भी देखने को मिलते हैं। चितौड़गढ़ के किले पर बहुत सी इमारते हैं।

  1. विजय स्तंभ-विजय स्तंभ का निर्माण 1448-1458 में किया गया था क्योंकि 1440 में राना कुम्भ ने मालवा के सुल्तान महमुद्द शाह प्रथम खिजली पर विजय प्राप्त की थी। विजय स्तंभ विजय का प्रतीक है। विजय स्तंभ 4.4 मीटर वर्ग के आधार पर बना हुआ है और यह 37.2 मीटर ऊँचा है। इसकी 158 सीढ़िया है जो 8वीं मंजिल तक जाती है और वहाँ से चितौड़गढ़ का मनमोहक नजारा दिखाई देती है। इसके ऊपर एक गुबंद है जिसे 19 वीं सदी में हानि पहुँचाई गई थी पर अभी उसे हर शाम लाईटों से सजाया जाता है।

2. भाक्सी- चत्रग तालाब के पास उतर की तरफ थोड़ी दुर आगे जाने पर दाहिनी ओर एक चारदिवारी से घिरा हुआ स्थान है जिसको बादशाह की भाक्सी कहा जाता है।             यहाँ पर राजा कुम्भ ने प्रथम खिजली को बंदी बना कर रखा था।

  1. घोड़े दौड़ाने का चौगान-भाक्सी से पश्चिम में थोड़ी दुरी पर खंडर है जिनको पूर्व में घोड़े दौड़ाने का चौगान है।
  2. रानी पद्मिनी का महल-चौगान के पास ही झील के किनारे रानी पद्मिनी के छोटे महल है। झील के बीचोबीच एक छोटा महल है जिसे जनाना महल कहते हैं और किनारों पर बने महलों को मर्दाना महल कहते हैं। किनारे के एक महल में दर्पण इस तरह से लगा है कि झील के बीच में बने महल की सीढ़ियों पर खड़े व्यक्ति का प्रतिबिंब उसमें साफ नजर आता है। अलाउद्दीन खिजली ने इस दर्पण में ही रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था।

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  1. खातर रानी महल-पद्मिनी महल के तालाब के दक्षिणी किनारे पर महाराजा क्षेत्र सिंह की उपपत्नी रानी खातर
    के महल के खंडर है।
  2. गोरा बादल की घुमरे-पद्मिनी महल के दक्षिण पूर्व में दो गुबंदकार इमारते हैं जिन्हें गोरा और बादल की इमारत कहा जाता है। गोरा रानी पद्मिनी के चाचा थे और बादल उनका चचेरा भाई था।

7. राव रणमहल की हवेली- गोरा बादल की घुमेर से सड़क पर थोड़ा आगे जाकर पश्चिम की ओर एक विशाल इमारत के खंडर है जो कि राव रणमहल की हवेली थी।            राव रणमहल की बहन हँसाबाई का विवाह महाराज लाखा से हुआ था।

  1. कालिका मंदिर-पद्मिनी महल के उतर में बाईं ओर कालिका जी का एक विशाल कुर्सी वाला मंदिर है जो कि 9वीं सदी में गुहिलवंशीय राजाओं ने बनवाया था। यह मूल रूप से एक सूर्य मंदिर था। इसकी छतों और दिवारों की खुदाई दर्शनीय है। यहाँ हर साल वैशाख की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मेला लगता है।
  2. सूर्यकूंड-कालका मंदिर के उतर पूर्व में एक विशाल कुंड है जिसे सूर्य कुंड कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस कुंड में से रोज सफेद घोड़े पर एक सशक्त योद्धा निकलता था जो महाराणा को युद्ध में सहायता करता था।
  3. जैमल पत्ता की हवेली-गोमुख कुंड और कालिका मंदिर के मध्य में जैमल पत्ता की हवेली है। राठौड़ जयमल और सिसोदिया पत्ता अकबर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। महल को पूर्व में एक तालाब है जिसे जैमल पत्ता का तालाब कहा जाता है।
  4. गोमुख कुंड-महासति या जौहर स्थल के पास में गोमुख कुंड है जो कि चट्टानों से बना है और इससे भूमिगत जल निरंतर झरने के रूप में शिवलिंग के उपर गिरता रहता है।
  5. समाधिश्वर महादेव का मंदिर-गोमुख कुंड के उतरी छोर पर महादेव का एक भव्य और प्राचीन मंदिर है जिसे 11वीं सदी में राजा भोज ने बनवाया था। इसे त्रिभुवन नारायण का शिवालय और भोज का मंदिर कहा जाता है। इसके गर्भगृह में नीचे की तरफ शिवलिंग है और पीछे की दिवार पर शिवजी की त्रिमूर्ति है।
  6. History of Chittorgarh Fort

  7. महासती या जौहर स्थल-समाधीश्वर मंदिर और विजय संतंभ के बीच में चार दिवारी से घिरा हुआ एक खुला मैदान है जिसके पूरव और उतर में दो द्वार है। यहाँ पर रानी पद्मिनी ने 13000 वीरांगनाओं के साथ विश्व प्रसिद्ध जोहर किया था।
  8. जटाशंकर शिवालय-विजय स्तंभ के उतर में जटाशंकर नामक शिवालय है जिसमें बहुत सी देवताओं की मूर्तियाँ है।
  9. कुंभश्याम का मंदिर-महाराणा कुंम्भ ने 1149 में विष्णु भगवान के बारह अवतार का यह भविय मंदिर बनवाया था जिसमें उनकी अलग अलग रूप की मूर्तियाँ थी। पहले यहाँ पर वराहवतार की मूर्ति थी लेकिन मुस्लिम आक्रमणों के दौरान वह खंडित हो गई और वहाँ पर कुंभश्याम की मूर्ति को स्थापित किया गया।
  10. मीराबाई मंदिर-कुंभश्याम के मंदिर के प्रांगण में ही श्याम दिवानी मीराबाई का मंदिर है जिसमें मीरा और कृष्ण जी का सुंदर चित्र है। मंदिर के सामने एक छतरी है जिसके नीचे मीराबाई के गुरू स्वामी रैदास के चरणचिंह अंकित है।
  11. सतबीस देवला-किले पर एक भव्य जैन मंदिर भी है जिसे 11 वीं सदी में बनाया गया था। इसमें 27 देवरियाँ बनी हुई है जिस कारण इसे सतबीस कहा जाता है।

18. महाराणा कुम्भा के महल- जिन महलों का जीणोर्दार महाराणा कुम्भ ने करवाया था उन्हें महाराणा कुम्भा के महलों के नाम से जाना जाता है। इन महलों में तहखाना            है जिसकी सुरंग से गौमुख कुंड तक जाया जा सकता है।

History of Chittorgarh Fort

  1. फतह प्रकाश-महाराणा फतह सिंह के नाम पर फतह प्रकाश नामक महल है जिसे आधुनिक ढंग से बनाया गया था। इसमें गणेश जी की एक भव्य मूर्ति है।
  2. मोती बाजार-फतह प्रकाश से थोड़ा आगे दुकानों की लाईन है जहाँ प्राचीन काल में पत्थरों की बहुत सारी दुकाने हुआ करती थी।
  3. शृंगार चौरी-शृंगार चौरी का निर्माण महाराणा कुम्भा के कोषाध्यक्ष बेलाक ने करवाया था। यह भगवान शान्तिनाथ का मन्दिर है जिसमें उनकी चौमुखी मूर्ति थी। मुस्लिम आक्रमणों के बाद सिर्फ एक वेधी बची है जिसे लोग चौरी कहते हैं। इसकी दिवारों पर देवी देवताओं और नृत्य आकार की बहुत सी मूर्तियाँ बनी हुई है।
  4. महाराणा साँगा का देवरा-शृंगार चौरी के दक्षिण में भगवान देवनारायण का मंदिर है जिसे महाराणा साँगा ने बनवाया था।
  5. तुलजा भवानी का मंदिर-यह भवानी का मंदिर है जिसे दासी पुत्र बनवीर ने 1536-1540 में बनवाया था। उसने अपने वजन के बराबर सोना तुलवाकर इस मंदिर का निर्माण करवाया था जिस कारण इसे तुलजा मंदिर कहा जाता है।
  6. बनवीर की दीवार-दासीपुत्र बनवीर ने 1536 में छल से राजा विक्रमादित्य को मार दिया था जिसके बाद उसने किले को दो हिस्सों में विभाजित करने के लिए दीवार का निर्माण किया लेकिन वह दिवार अधुरी ही रह गई थी।

25. नवलखा भण्डार- बनवीर की दीवार के पश्चिमी सिरे पर एक अर्द्ध वृताकार अपूर्ण बूर्ज है जिसमें अस्त्र शस्त्र रखे जाते थे। कहा जाता है कि यहाँ नौ लाख का खजाना भी था और इसके आकार को कोई जान नहीं सका था जिस कारण इसे नवलखा भंडार कहा जाता है।

  1. पातालेश्वर महादेव का मंदिर-यह मंदिर 1565 में बनाया गया था और पुरातत्व संग्रहालय के पास बनाया गया है। इसकी कला बहुत ही उत्कृष्ट है।
  2. भामाशाह की हवेली-किले पर एक ईमारत है जो महाराणा प्रताप को अपना सब कुछ दान करने वाले दानवीर भामाशाह की याद दिलाती है।
  3. आल्हा काबरा की हवेली-भामाशाह की हवेली के पास ही आल्हा काबरा की हवेली है।

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