हरियाणा के पुरातात्त्विक स्मारक, किले, महल, तालाब संग्रहालय

हरियाणा के पुरातात्त्विक स्मारक, किले, महल, तालाब तथा संग्रहालय

आज इस लेख में हम हरियाणा के पुरातात्त्विक स्मारक, किले, महल, तालाब तथा संग्रहालयों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। हरियाणा के पुरातात्त्विक स्मारक, किले, महल, तालाब तथा संग्रहालयों के बारे में विभिन्न परिक्षायों में प्रश्न पूछे जाते हैं।

  • आध्यात्मिक संग्रहालय, पानीपत –पानीपत नगर में आश्रम रोड पर स्थित प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का आकर्षक भव्य भवन निर्मित है। यह तीन मंजिला भवन अत्यधिक सुंदर होने के कारण मनमोहक है आमजन इस भवन को 5 मूर्तियों वाले आश्रम के नाम से जानते हैं क्योंकि इस भवन में फाइबर से निर्मित पांच प्रमुख धर्मों की भव्य मूर्तियां एक ही ज्योति बिंदु शिव की ओर इशारा कर रही है।
  • इब्राहिम खान का मकबरा, नारनौल – इस मकबरे का निर्माण शेरशाह सूरी ने अपने दादा इब्राहिम खान की याद में सन 1543-44 के आस पास करवाया था नारनौल नगर के दक्षिण में घनी आबादी के बीच स्थित इब्राहिम खान का मकबरा एक विशाल गुंबद के आकार का है लोदी शासनकाल में इब्राहिम खान नारनोल के जागीरदार रहे थे मकबरे के भीतरी भाग में इब्राहिम खान की कब्र है जिस पर शाही खानदान का निशान भी अंकित है।
  • इब्राहिम लोदी की मजार, पानीपत –एक ऐतिहासिक मकबरा पानीपत के तहसील कार्यालय के निकट स्थित है 1526 में इब्राहिम लोदी ने बाबर के साथ युद्ध किया था जिसमें उसकी पराजय हुई और वह मारा गया था युद्ध स्थल पर ही इब्राहिम लोदी को दफनाया गया था बाद में अंग्रेजों ने लाखोरी ईटों से स्थान पर एक बहुत बड़ा चबूतरा बनवाया तथा एक पत्थर पर उर्दू में इस कब्र के महत्व के बारे में लिखवाया।
  • काबुली बाग, पानीपत –पानीपत के निकट काबुली बाग में एक मस्जिद तथा तालाब बना हुआ है यह बाग बाबर ने पानीपत की प्रथम लड़ाई में विजय की खुशी तथा अपनी सबसे प्रिय रानी मुसम्मत काबुली बेगम की याद में बनवाया था भारत में मुगल वास्तु शिल्प कला की यह प्रथम इमारत है जिसका निर्माण कार्य सन 1529 में पूरा हुआ।
  • काला अम्ब, पानीपत –पानीपत से 8 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में काला अंब में 1761 में पानीपत का तीसरा युद्ध अफगान सरदार अहमद शाह अब्दाली और मराठा सरदार सदा शिवराय भाऊ के मध्य हुआ था युद्ध में मराठों की पराजय हुई कहा जाता है कि इस स्थान पर आम का एक वृक्ष था पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों का इतना खून बहा की धरती लाल हो गई आम का वृक्ष भी वृद्ध होने से काला पड़ गया था तभी से इस स्थान को काला अंब नाम से जाना जाता है इस स्थान पर हरियाणा सरकार ने वार हीरोज मेमोरियल विकसित किया यहां संग्रहालय भी स्थापित किया गया है।
  • महल एवं बाराखंबा छतरी, होडल –फरीदाबाद जिले के होटल नगर में स्थित महल हनुमा हवेली का निर्माण 1754 से 1764 ईस्वी के बीच भरतपुर के राजा सूरजमल के ससुर चौधरी काशीराम सोरोत ने करवाया था महारानी किशोरी राजा सूरजमल की धर्मपत्नी और चौधरी काशीराम की पुत्री थी सूरजमल से संबंध होने के उपरांत चौधरी काशीराम को सोरोतों  के 24 गांव का चौधरी बना दिया गया और इन गांव से मिलने वाले राजस्व में उसे हिस्सा दिया जाने लगा इस तरह रुतबा बढ़ जाने से चौधरी काशीराम ने एक शानदार हवेली और कचहरी भवन का निर्माण करवाया।
  • कुंजपुरा और तरावड़ी के किले –जिला करनाल में स्थित कुंजपुरा नामक स्थान पर छोटी-छोटी ईटों से बनी हुई एक हवेली थी जिसका अब प्रवेशद्वार ही बचा है इसे कुंजपुरा के नवाब निजावत खान ने सन 1765 के आसपास बनवाया था दुर्ग का तो अब नामोनिशान भी नहीं रहा। करनाल के तरावड़ी नामक स्थान पर एक सराय है जिसका निर्माण शाहजहां के शासनकाल में हुआ था इसे भ्रमवश आज भी पृथ्वीराज चौहान द्वारा बनवाया गया दुर्ग मानते हैं जबकि राजपूत काल में बनाए जाने वाले दुर्ग और मुगलकालीन सराय के वास्तुशिल्प में मौलिक भिन्नताएं होती हैं।
  • कोस मीनार, कोहण्ड –शेरशाह सूरी ने महामार्ग का निर्माण करवाया था जिसको ऐतिहासिक जीटी रोड के नाम से भी जाना जाता है उसने जनता की सुविधाओं के लिए मार्ग के प्रत्येक कोस पर एक मीनार खड़ी करवाई थी जिसको कोस मीनार कहा गया। शेरशाह सूरी के काल की मुंह बोलती तस्वीर के रूप में हरियाणा क्षेत्र में मौजूद सुदृढ़ ढांचे में निर्मित यह ऐसी मीनारें हैं जो ऊपर से पतली और नीचे से चौड़ी हैं शायद इस तरह के निर्माण के पीछे निर्मित निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि महामार्ग से आते हुए दूर से ही है ज्ञात हो जाए कि उनके अगले पड़ाव की दूरी अब कितनी शेष है अथवा वे कहां तक आ चुके हैं।
  • ख्वाजा की सराय, फरीदाबाद –फरीदाबाद जिले के गांव सराय ख्वाजा में लगभग 300 वर्ष पुरानी एक सराय है इस राय के नाम पर ही गांव का नाम सराय ख्वाजा पड़ा यह सराय पीर ख्वाजा ने बनवाई थी।
  • गऊ कर्ण तालाब, रोहतक –गऊ कर्ण नामक तालाब रोहतक नगर में स्थित है सन 2004 2005 में इस तालाब का नवीकरण किया गया प्राचीन तालाब पर उत्तर में जनाना घाट एवं पश्चिम तथा पूर्व में 6 मर्दाना घाट और पूर्व में गौ घाट था यहां स्थित डेरा बाबा लक्ष्मण पुरी इस तीर्थ की देखभाल करते हैं इसका निर्माण 1558 ईस्वी में करवाया गया था।
  • चनेटि स्तूप, जगाधरी –जगाधरी नगर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित स्तूप का प्रथम विवरण चीन के विद्वान यात्री ह्वेनसांग के यात्रा संस्मरण से प्राप्त होता है वे यहां सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में आए थे हेनसांग ने लिखा है कि यह स्तूप शत्रुघ्न गांव से पश्चिम की ओर यमुना के दाएं तट प्रदेश में स्थित है और यहां इसके अलावा दसियों अन्य स्तूप भी हैं यह भी लिखा है कि सत्रुघन में एक बहुत बड़ा बौद्ध मठ भी है जिसमें सैकड़ों भिक्षुक निवास करते हैं इसका निर्माण संभव है सम्राट अशोक के समय किया गया था।
  • चोर गुम्बद, नारनौल –नारनोल नगर कि उत्तर-पश्चिम दिशा में एक ऊंचाई वाले स्थान पर निर्मित ऐतिहासिक स्मारक चोर गुंबद का निर्माण जमाल खान नामक एक अफगान ने अपने ही समाधि स्थान के रूप में करवाया था।
  • जल महल, नारनौल –ऐतिहासिक स्मारक जल महल नारनौल नगर के दक्षिण में आबादी से बाहर स्थित है इसका निर्माण सन 1591 में नारनौल के जागीरदार शाह कुली खान ने करवाया था पानीपत के ऐतिहासिक प्रसिद्ध द्वितीय युद्ध में शाह कुली खान ने हेमू को पकड़ा था इसी उपलक्ष में अकबर ने प्रसन्न होकर शाह कुली खान को नारनोल की जागीर सौपी थी जल महल का निर्माण लगभग 11 एकड़ के विशाल भूखंड पर किया गया।
  • तावडू के मकबरे –तावडू ग्राम में अनेक मकबरे पश्चिम छोर पर बने हुए हैं जिनका निर्माण उत्तर इस्लामिक काल में संभवत सुन 15 सौ के आसपास हुआ था इनमें से एक मकबरे का जीर्णोद्धार सन 2007 में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरीटेज नामक संस्था ने किया है इस परिसर में सात-आठ मकबरे हैं जो संरक्षित घोषित नहीं हुए हैं।

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  • बैठक भवन, डीघल –प्रसिद्ध साहूकार लाला फतेह चंद ने डेंजेल गांव में सन 18 सो 80 के आसपास एक कलात्मक बैठक भवन का निर्माण करवा इसी आज भी उसकी कलात्मक अभिरुचि और उसके खानदान की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है इसमें एक गद्दी कक्ष, एक पार्श्व कक्ष, 2 ओबरे और एक जमींदोज भोरे के अलावा पूर्व मुख शानदार बरामदा बनवाया गया।
  • जींद का किला –सन 1775 में जगपत सिंह ने जींद को जीतकर यहां पर एक विशाल किले का निर्माण करवाया विजयनगर के पहले राजा बने थे आज भी इस ऐतिहासिक किले के भग्नावशेष मीलों दूर से दिखाई देते हैं।
  • तावडू का किला –सोहना से 17 किलोमीटर दूर पर्वतीय रास्ते से होते हुए हरियाणा राजस्थान मार्ग पर स्थित तावडू नामक ग्राम में स्थित एक प्राचीन किले के विभिन्न अवशेषों से तावडू के इतिहास की जानकारी मिलती है इस किले के चारों ओर ऊंची ऊंची दीवारें बनी हुई हैं इस समय तावडू स्थित इस किले को वहां का थाना बना दिया गया है।
  • तोशाम की बारादरी –भिवानी जिले में स्थित तो शाम की पहाड़ी पर यह बारादरी स्थित है लोकमानस में यह बारादरी पृथ्वीराज की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध है इस बारादरी के निर्माण में चुने और छोटी ईटों का प्रयोग किया गया है इस भवन की विशेषता यह है कि इसमें एक भी चौखट का प्रयोग नहीं किया गया है और इसमें 12 द्वार इस तरह से स्थापित किए गए हैं कि केंद्रीय कक्ष में बैठा हुआ व्यक्ति चारों और देख सकता है प्रत्येक कक्ष द्वार 5 मीटर ऊंचा है और इसके चारों और बैठने के लिए एक चबूतरा बना हुआ है।
  • मटिया किला, पलवल –मुगल काल में पलवल में मटिया किला बनवाया गया था यह किला अब खंडहर में परिवर्तित हो चुका है शेरशाह सूरी के समय में पलवल तहसील के ग्राम बुलवाना में बनवाई गई मीनार तथा ग्राम अमरपुर में 150 वर्ष पुराना गोल मकबरा अफगान कला का घोतक है इस तहसील के ग्राम जैनपुर में पक्की ईंटों से बना एक तालाब भी है।
  • रंगमहल, बुड़िया यमुनानगर-यमुनानगर से 3 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में बुडिया नामक प्राचीन कस्बे के समीप शाहजहां के शासनकाल में आबादी से दूर जंगलों में रंग महल का निर्माण करवाया था जो उस समय आमोद प्रमोद का प्रमुख स्थान रहा होगा उसकी दीवारों पर बनाए गए  भित्तिचित्र धूमिल हो रहे हैं।
  • महम की बावड़ी –रोहतक जिले के महम कस्बे के दक्षिण पूर्वी छोर पर एक बावड़ी बनी हुई है यह मुगल स्थापत्य कला का नमूना है यह बावड़ी शाहजहां के शासनकाल में सैदू कलाल ने 656 ईसवी में बनाई थी इस बावड़ी की लंबाई 275 फुट तथा चौड़ाई 95 फुट है इसकी 4 मंजिलें हैं तथा अंदर जाने के लिए 108 सीढ़ियां हैं इसके बाद चौक आता है और उसके बाद कुआं है।
  • महल, डीघल –रोहतक से झज्जर मार्ग के पूर्व में बसे हुए डिघल ग्राम में बहुत साल पहले द्वारका और चौकी सेठ भाइयों ने एक दो मंजिला हवेली का निर्माण करवाया जो आज भी मौजूद है महल के नाम से प्रसिद्ध इस हवेली में ऊंची महसब देकर किले जैसी शैली का प्रवेश द्वार बनाया गया है।
  • माधोगढ़ का किला, महेन्द्रगढ़ –महेंद्रगढ़ से 15 किलोमीटर दूर सतनाली सड़क मार्ग पर अरावली पर्वत श्रंखला की पहाड़ियों के बीच सबसे ऊंची चोटी पर माधोगढ़ का ऐतिहासिक किला स्थित है पर्वत की तलहटी में माधोगढ़ ग्राम बसा है ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण राजस्थान के सवाई माधोपुर के शासक माधोसिंह ने करवाया था इस समय है किला अत्यंत  जिर्णोअवस्था में है लगभग 800 वर्ग गज के क्षेत्र में फैले इस किले में 30 कोठियां बनी हुई है मुख्य किले से कुछ नीचे 12 कोठिया हैं जो चोटी पर स्थित तालाब के अंगोर में ग्रीष्म ऋतु में शरण लेने के लिए बनाई गई थी।
  • बागवाला तालाब, रेवाड़ी –इस तालाब का निर्माण सन 1807 में राय गुर्जर मल ने करवाया था वर्तमान में यह तालाब शुष्क हो चुका है।
  • मिर्जा अली जाँ की बावड़ी, नारनौल – नारनोल नगर को बावड़ी और तालाबों का नगर कहा जाता है यद्यपि नगर की बहुत सी प्राचीन बावडीयों का अस्तित्व अब नहीं रहा परंतु मिर्जा अली जाँ की बावड़ी आज भी जिर्णोअवस्था में विद्यमान है इस ऐतिहासिक बावड़ी का निर्माण मिर्जा अली जाँ द्वारा 1650 ईसवी के आसपास करवाया गया था।
  • राजा नाहर सिंह की हवेली, बल्लभगढ़ –यह हवेली बल्लभगढ़ में दुर्ग प्राचीर के भीतर स्थित इस किले को बनवाने की योजना राजा बल्लू के शासनकाल में बनवाई गई थी जिसे उनके पुत्र किशन सिंह ने पूरा किया।
  • राय मुकुन्द दास का छत्ता ( बीरबल का छत्ता), नारनौल –नारनौल की सघन आबादी के बीच स्थित इस ऐतिहासिक स्मारक का निर्माण शाहजहां के शासनकाल में नारनौल के दीवान राय मुकुंद दास माथुर ने करवाया था यह स्मारक नारनोल के मुगलकालीन ऐतिहासिक स्मारकों में सबसे बड़ा है यद्यपि यह बीरबल के छत्ते के नाम से भी प्रसिद्ध है किंतु इसके निर्माण में बीरबल से इसका कोई संबंध नहीं है।
  • राव तेजसिंह तालाब, रेवाड़ी –यह रेवाड़ी के पुराने टाउन हॉल के समीप स्थित है यह कलात्मक तालाब का निर्माण राव तेज सिंह द्वारा सन 1810 से सन 1815 के बीच करवाया गया था।
  • श्रीकृष्ण संग्रहालय, कुरूक्षेत्र –श्री कृष्ण संग्रहालय की स्थापना कुरुक्षेत्र में की गई जो वर्ष 1991 में अपने वर्तमान भव्य और दर्शनीय स्वरूप में बनकर तैयार हुआ श्री कृष्ण संग्रहालय कुरुक्षेत्र पेहवा मार्ग पर ब्रह्मसरोवर और सन्निहित सरोवर के मध्य काली कमली वाले मैदान में स्थित है यह मुख्यतः श्री कृष्ण  एवं महाभारत के चरित्रों के माध्यम से जनसाधारण में आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण के साथ-साथ श्री कृष्ण के आदेशों के प्रति लोकर्षण उत्पन्न करता है।
  • सलारजंग गेट, पानीपत –पानीपत नगर के मध्य स्थित यह त्रिपोलिया दरवाजा प्राचीन आबादी का प्रवेश द्वार है जिसका निर्माण ब्रिटिश काल में हुआ था प्राचीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना कहलाने वाला यह दरवाजा नवाब सालारजंग के नाम से जाना जाता है।
  • किला, सोहना –जिला गुरुग्राम में स्थित सोना नगर 18 वीं शताब्दी में सोहन सिंह नामक राजा द्वारा बसाया गया था भरतपुर के राजा जवाहर सिंह के समय यहां पर एक किले का निर्माण करवाया गया जो खंडहर के रूप में आज भी विद्यमान है।
  • होडल की सराय, तालाब और बावड़ी –होटल में भरतपुर के राजा सूरजमल ने एक सुंदर सराय तालाब और एक बावड़ी बनवाई थी आज भी इनके खंड हर यहां देखने को मिलते हैं मॉडल के रानी सती तालाब के समीप बलराम की स्मारक छतरी और दादी सती जसकोर की समाधि भी मौजूद है।
  • बुआ का तालाब, झज्जर –झज्जर में दिल्ली झज्जर मार्ग पर 300 साल पुराना बुआ का तालाब काफी प्रसिद्ध है यह जगह दो प्रेमियों के मिलने और बिछड़ने की दास्तां की गवाह है इस तालाब नेबुआ नाम की एक लड़की के प्रेम को परवान चढ़ते हुए भी देखा और उसे अपने प्रेमी के विरह की आग में जलते हुए भी देखा।
  • गरम जल का चश्मा, सोहना –अरावली पर्वतीय श्रंखला की गोद में बसा है हरियाणा के गुड़गांव जिले का विश्वविख्यात स्थान सोहना अपने गरम जल के स्रोतों के कारण यह स्थान आज अपनी पहचान दूर-दूर तक कायम कर चुका है।
  • पुण्डरीक सरोवर, पुण्डरी –यह सरोवर हरियाणा के पुण्डरी नामक कस्बे में स्थित है ऐसी मान्यता है कि सतयुग से आज तक इस विशाल सरोवर का जल कभी समाप्त नहीं हुआ।

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